किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

मुनव्वर रानामुनव्वर राना26 Sept 1952 – 14 Jan 2024

1 min read · 12.4K reads

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई

यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया

मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई

अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता

बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई

किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद

उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई

मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी

तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई

क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता

ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई

घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं

उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई

कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती

इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई

मुनव्वर राना
About the poet

मुनव्वर राना

मुनव्वर राना (जन्म: 26 नवंबर 1952,मृत्यु: 14 जनवरी 2024, रायबरेली, उत्तर प्रदेश) उर्दू भाषा के साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक कविता शाहदाबा के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[1] वे लखनऊ में रहते हैं। भारत-पाकिस्तान…

View profile & all 45 Poems / Stories

More from मुनव्वर राना

  1. इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

    इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिएआप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए

    12.4K reads
  2. भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है

    भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता हैमोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है

    12.4K reads
  3. बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना

    बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होनाआप आसान समझते हैं मुनव्वर होना

    12.4K reads
  4. ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना

    ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जानामगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आप का गुलनार हो जाना

    12.4K reads
  5. अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए

    अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आएफिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like