मेरी यह सोच

लीलाधर मंडलोईलीलाधर मंडलोई

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निस्बतन मेरी यह सोच बन गई

मैं एकदम घुन्ना हो गया

मेरी आवाज़ को लकवा मार गया

मेरी मुट्ठियाँ दीवार से चिपक गई हैं

मेरी आँखों में मोतियाबिंद हो गया

मेरे पाँव में बेड़ियाँ पड़ी हैं

मेरी आत्मा तक रेहन पड़ी है

मेर राष्ट्रवाद फ़िज़ूल हो उठा है

मेरा धर्म सवालों के कठघरे में है

मेरी जाति खो गई है

मेरी पुश्तैनी आधारकार्ड बेमतलब

मेरी उँगलियों में छिपी पहचान लुप्त हो गई है

मेरा यह देश मुझे अब अपना नागरिक नहीं मानता

मैं अपने ही देश में शरणार्थी हो गया हूँ।

लीलाधर मंडलोई
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लीलाधर मंडलोई

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