उसकी मुस्कुराहट परतदार समुद्री लहरों जैसी थी
होंठों के कोर से ख़ुद को छुआ कर लौटती
आवाजाही का वह खेल खेलती
जो बिल्लियाँ अपने मालिकों से खेलती हैं
जब वह भरपूर पुलक से मुस्कुराता था
उसकी नाक के दोनों तरफ़ गालों की पेशियाँ ऐसे उमगती थीं
जैसे उड़ने से ठीक पहले पक्षी डैने फुलकाते हैं
हरे बाँस की बाँसुरी से नवयौवना दुर्गा
आश्विन की हवा के सुर फूँकती-सी लगती थी
जब सफ़ेद फूली कांसी के कुंज उसकी हँसी में लहलहाते थे
मैं ज़रा-सी फूँक मारकर अगर उड़ा देती
उसके चेहरे से अवसाद की स्याह राख
तो नारंगी लपटों का सधा हुआ नृत्य थी उसकी हँसी
उसका मन हरा था, मन के घाव भी हरे थे
एक हरापन उसकी देह में भी था, वह सिहरता था
देह में सरसों की पीली बाड़ी फूटती थी
उसका मेरे साथ होना दरवाज़े के दो पल्लों का साथ होना था
एक दूसरे की उँगलियों में फँसी उँगलियाँ हल्के-से छोड़कर
हम अपने बीच से लोगों को आवाजाही करने देते थे
उसका मेरे साथ होना द्वार के दोनों ओर लगे
सज़ावटी अशोक के हमउम्र पेड़ों का साथ होना था
जिन पर झाँझ, बरसात, वसंत सब एक जैसे असर करते थे
उसका मेरा साथ होना मोम और उसकी बाती का साथ होना था
वह तिल-तिल जलाता था
रौशनी फैलाने के नियम से बँधी मेरी काँपती-सी साँसों की लौ
उसके साथ ही लगातार मिटती जाती थी
उसने ऐसे समेटा था अपने मन में मेरा प्रेम
जैसे वृंत से गिर जाने से पहले अंतिम दफ़ा फूल
अपनी पंखुड़ियाँ समेटता है।








