कहाँ देखा था तुम्हें!
निर्मल आकाश में
या
घास के मैदान में?
धुंध में छिपे पहाड़ पर
आ लुईत की
लाल छाती में?
अब याद नहीं है
मेरे पथ में है
आज केवल
कीचड़ और गर्द।
वहाँ भी क्या
तुम ही
मिलोगी?
कहाँ देखा था तुम्हें!
निर्मल आकाश में
या
घास के मैदान में?
धुंध में छिपे पहाड़ पर
आ लुईत की
लाल छाती में?
अब याद नहीं है
मेरे पथ में है
आज केवल
कीचड़ और गर्द।
वहाँ भी क्या
तुम ही
मिलोगी?

सुप्रसिद्ध असमिया कवि-कथाकार-समालोचक और अनुवादक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।
View profile & all 7 Poems / Storiesएक बार एक कुएँ के पास अकेला खड़ाथा और कुएँ के अंदर झाँककर देखा।
(भ्रमण के एक दिन)आसमान के बीचों-बीच शारदी पूनो का चाँद
आईने में दिखाई दे रहा शख़्स ही क्या मैं हूँ?काले-सफ़ेद खिचड़ी बाल, लंबी ठुड्डी, सलवट भरी भौं,
तुम्हारी आँखों के दर्पण में दिखता हैएक सूर्यमुखी
हमारे शहर के मैदान मेंउत्सव की बहार है।