नींद में जैसे सपना
जैसे किसी अपने का विलाप
जैसे पपीहे की बोली
वह सुबह की ओर देखने की एक शुरुआत है
जो एक शाम से शुरू होती है
जैसे अँधेरे में कोई उम्मीद
जैसे रात के राहगीर के हाथ में चोरबत्ती
दरअस्ल, वह किसी किसान के माथे की बूँद है
जो फ़सलों की जड़ों की ओर लौटना चाहती है
और जैसे किसी महबूब का इंतज़ार
किसी महबूबा का ग़ुस्सा...
वह किसी के हाथों की सफ़ाई है
तो वह किसी के पाँवों की फटी हुई बिवाई है
कविता क्या है
क्या आपको पता है कि कविता क्या है...








