एक काफ़िर-अदा ने लूट लिया

Gulzar DehlaviGulzar Dehlavi7 Jul 1926 – 12 Jun 2020

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एक काफ़िर-अदा ने लूट लिया

उन की शर्म-ओ-हया ने लूट लिया

इक बुत-ए-बेवफ़ा ने लूट लिया

मुझ को तेरे ख़ुदा ने लूट लिया

आश्नाई बुतों से कर बैठे

आश्ना-ए-जफ़ा ने लूट लिया

हम ये समझे कि मरहम-ए-ग़म है

दर्द बन कर दवा ने लूट लिया

उन के मस्त-ए-ख़िराम ने मारा

उन की तर्ज़-ए-अदा ने लूट लिया

हुस्न-ए-यकता की रहज़नी तौबा

इक फ़रेब-ए-नवा ने लूट लिया

होश-ओ-ईमान-ओ-दीन क्या कहिए

शोख़ी-ए-नक़श-ए-पा ने लूट लिया

रहबरी थी कि रहज़नी तौबा

हम को फ़रमाँ-रवा ने लूट लिया

एक शोला-नज़र ने क़त्ल किया

एक रंगीं-क़बा ने लूट लिया

हम को ये भी ख़बर नहीं 'गुलज़ार'

कब बुत-ए-बेवफ़ा ने लूट लिया

हाए वो ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू तौबा

हम को बाद-ए-सबा ने लूट लिया

उन को 'गुलज़ार' मैं ख़ुदा समझा

मुझ को मेरे ख़ुदा ने लूट लिया

Gulzar Dehlavi
About the poet

Gulzar Dehlavi

Anand Mohan Zutshi Gulzar Dehlavi (Urdu: آنند موھن زتشی گلزار دہلوی; Hindi: आनंद मोहन जुत्शी गुलजार आनंद मोहन जुत्शी गुलजार देहलवी) (7 July 1926 – 12 June 2020) was a prominent veteran Urdu poet, a celebrated scholar, and journalist. He was honored by the vic…

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