एक पैसे में... - घनश्याम कुमार देवांश

घनश्याम कुमार देवांशघनश्याम कुमार देवांश2 Sept 1986

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सुबह बहुत उदास थी
और मेरे भाड़े के कमरे में
धूप के तंतु ओढ़े
दूर तक पसर आई थी
कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था
दरवाज़े के बाहर की चिड़िया भी
रेलिंग पर हिलती डुलती
खामोश बैठी थी
और हवा का संवादहीन शोर
एक निरर्थक सायरन की तरह
बज रहा था
जबकि मैं इस सवाल से जूझ रहा था
कि सुबह इतनी सुबह सुबह
आखिर इतनी उदास क्यों थी
कि,
सबके सब ही जैसे उदास थे,
चुप थे,जबकि
कालदरें इतनी सस्ती थीं
कि पूरे दिन और पूरी रात
सिर्फ एक पैसे में
बात की जा सकती थी.....
घनश्याम कुमार देवांश
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घनश्याम कुमार देवांश

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