वह अब चला गया तो अफ़सोस क्यों है
किसलिए ये मर्सिए
ग़मज़दा हो किसलिए
तुम्हारी महफ़िल में था जो बैठा
शाम ढलते, रात होते
तुम्हारे ताने, तुम्हारे फ़िकरे
सुन रहा था वो सब मुस्कुराके
हज़ार उँगलियाँ थीं उसकी जानिब
काले चश्मे की जिल्द से वो
यूँ देखता था कि कुछ कहेगा
उतरते चाँद तक जो था साथ तुम्हारे
भोर होने से पहले उठा अचानक
सोचा कि कहे ‘ये सभा बर्ख़ास्त होती है’
फिर ये सोचकर चुपचाप चल दिया होगा
कि फ़ैसले हाकिम सुनाते हैं
इस बीच टूटा होगा कोई तारा
और टूटती साँसों के बीच शायद कहा होगा उसने
‘इस महफ़िल को रखना आबाद साथी’
या फिर
कहते-कहते वह रुक गया होगा
क्योंकि फ़ैसले हाकिम सुनाते हैं।








