मर्द रोते नहीं हैं

फ़िरोज़ ख़ानफ़िरोज़ ख़ान

2 min read · 12.4K reads

मूँछों पर ताव देते हुए यही कहते थे दादा

दादी के इंतक़ाल के बाद जब रो रही थीं घर की औरतें

और नहीं रोक पाया था मैं भी ख़ुद को

ग़मगीन दादा तब भी यही बोले थे

मर्द बच्चे हो तुम

मर्द रोते नहीं हैं

गाँव भर का यही क़िस्सा था

किसी मर्द की आँखों में भूले-से भी नहीं आते थे आँसू

और गर ऐसा हो गया तो

तो मर्दों की बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था वह आदमी

क्योंकि मर्द रोते नहीं हैं

कुछ ऐसी ही कहानी उस औरत की होती थी

जो नहीं रोती थी

गाँव में किसी के भी मर जाने पर

पति के बीमार होने या बच्चे के ठोकर खाकर गिरने पर

गाँव भर के आँसू उधार होते थे उस औरत पर

औरत की आँख के गहने होते हैं आँसू

मर्द रोते नहीं हैं

दादा के साथ गाँव भर के लोग यही मानते थे

फ़ौलादी होते हैं मर्दों के सीने

चिंगारी निकलती है आँखों से उनकी

पिता, भाई और दोस्तों को फ़ख़्र है अपने गाँव पर

गाँव की मर्दानगी पर

सीने में धधकती आग पर

फ़ख़्र है कि मर्द रोते नहीं हैं

वे रोते नहीं हैं तब भी जब मर रही होती है वह औरत

जिसने ज़िंदगी भर किया था उन्हें प्यार

बहन ससुराल से आती है तो माँ की आँखें गीली हो जाती हैं

उसका हिलक-हिलक कर रोना सुनकर

माँ धीरे से कहती है उससे

जी भर कर रो ले

रोने से जी हल्का हो जाता है

एक दिन मैंने पूछ ही लिया रीना से

औरतों का जी भारी क्यों हो जाता है

मुस्कुराते हुए उन्होंने बस इतना कहा

मर्द नहीं समझ पाएँगे

औरतों का जी औरत होकर ही समझा जा सकता है

बहुत बाद में एक दिन

रीना ने कहा था

मर्द रोते नहीं हैं

उनके सीने की आग

सुखा देती है आँखों का पानी

औरत अपनी आग से चूल्हा जलाती है

और आँखों के समंदर से

मुहब्बत के दिए।

फ़िरोज़ ख़ान
About the poet

फ़िरोज़ ख़ान

चंबल के बीहड़ों का पड़ोस रखने वाले कवि-पत्रकार। जनवादी विचारों के लिए उल्लेखनीय।

View profile & all 8 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीमुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयामैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजप्रतिज्ञाप्रतिज्ञाएँ बहा दो पानी में लड़कीप्रतिज्ञाएँ बहाओ पानी में;— बीरेंद्र चट्टोपाध्याय