पहाड़-16

ब्रजरतन जोशीब्रजरतन जोशी

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पथरीले

पथ से

चोटियों के नुकीलेपन को रौंदते

ऊपर मिलता है

एकांत

अकेलापन पीछे छूट जाता है

हाँ, यहीं तो कविता रहती है

हाँ, यहीं से तो उसने मन के

महकमे को कहलवाया

अपना संदेश

कि आगे प्रवेश वर्जित है

यात्री अपने जोखिम पर है

फिर भी कोई चाहे

तो कर ले कविता

लोक की यात्रा।

ब्रजरतन जोशी
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ब्रजरतन जोशी

ब्रजरतन जोशी

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