चलते-चलते

भारतभूषण अग्रवालभारतभूषण अग्रवाल

1 min read · 12.4K reads

मैं चाह रहा हूँ, गाऊँ केवल एक गान, आख़िरी समय

पर जी में गीतों की भीड़ लगी

मैं चाह रहा हूँ, बस, बुझ जाएँ यहीं प्राण, रुक जाए हृदय

पर साँसों में तेरी प्रीति जगी

इस लिए मौन हो जाता हूँ, स्वीकार करो यह बिदा

आज आख़िरी बार;

मत समझो मेरी नीरवता को व्यथा-जात

या मेरा निज पर अनाचार।

मैं आज बिछुड़ कर भी सचमुच ही सुखी हुआ मेरी रानी!

इतना विश्वास करो मुझ पर

मैं सुखी हूँ कि तुमने अपनी नारी-जन सुलभ चातुरी से

बिखरा दी मेरी नादानी

पानी-पानी करके सत्वर

सुखी हूँ कि इस बिदा-समय भी नहीं नयन गीले तेरे,

सुखी हूँ कि तुमने न बँटाए कभी अलभ्य स्वप्न मेरे,

सुखी हूँ कि कर सकीं मुझे तुम निर्वासित यों अनायास,

सुखी हूँ कि मेरा प्रमाद बन सका नहीं तेरा विलास!

में सुखी हूँ कि—पर रहने दो, तुम बस इतना ही जानो

मैं हूँ आज सुखी,

अंतिम बिछोह, दो बिदा आज आख़िरी बार ओ इंदुमुखी!

भारतभूषण अग्रवाल
About the poet

भारतभूषण अग्रवाल

अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ के कवि। जन्म : 02/08/1919 | मथुरा, उत्तर प्रदेश निधन : 23/06/1975 | शिमला, हिमाचल प्रदेश ‘तार सप्तक’ के कवि भारतभूषण अग्रवाल का जन्म 3 अगस्त, 1919 को तुलसी-जयंती के दिन उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के सतघड़ा मोहल्ले में हुआ। उन…

View profile & all 16 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like