भूरे बियाबान को मिट्ठू छोड़ चले

भालचंद्र नेमाड़ेभालचंद्र नेमाड़े27 May 1938

1 min read · 12.4K reads

भूरे बियाबान को मिट्ठू छोड़ चले

उड़ना चाहती हैं पहाड़ों की भी कतारें तलहटी उठाए

रोप दी हैं डालियों ने बरोहें* मेरी आँखों की थाह तक

डंठल... डंठल का स्पर्श है अभी

पत्ते... पत्तों की टुनगियाँ कह रही हैं ज़मीन से दूर हटो दूर हटो

और कहती हैं नीचे बना दो खोखल, सहा नहीं जाता।

उड़ जाने दो सारे पत्ते... भूरे सारे

बनाकर खत्ता दसों दिशाओं का एक, उसकी ओर

बनकर ओठों की सीटी निढालपने की, एक ही

छप जाने दो सारे अस्फुट इन डंठलों-डंठलों में

एक ही पेड़ के इस पतझड़ से भर जाने दो

सारा फ़ासला होने और है के बीच का तेरे और मेरे

पत्ते नहीं होंगे और लगेंगे ढेर

टूटकर झरने वाले इन पत्तों के भूरे।

आँखें जन्मांध की संचित कर रखती हैं घेरे पृथ्वी को तौलनेवाले अँधेरे के

उतने ढेर करूँगा जमा, आँखों की गहराई में लेते हुए बरोहों को

पिलाऊँगा अपनी अंजुरी से तुम्हें वह बेला,

तब तक तो रुको। बैठो भींचकर अपनी हवाएँ, अपनी प्यास।

रहने दो पेड़ को यों आँखों की थाह में मेरी सिसकते हुए,

दूर हटो दूर हटो ज़मीन से कह रहे पत्ते

सँभालते हुए तैरते-डोलते मिट्टुओं के झुंड।

*बरोह : बरगद की जटाएँ

भालचंद्र नेमाड़े
About the poet

भालचंद्र नेमाड़े

मराठी के समादृत कवि-लेखक और समालोचक। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित। मूल नाम : भालचंद्र वनाजी नेमाडे जन्म : 27/05/1938 | काजगाँव, महाराष्ट्र

View profile & all 5 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like