भूरे बियाबान को मिट्ठू छोड़ चले
उड़ना चाहती हैं पहाड़ों की भी कतारें तलहटी उठाए
रोप दी हैं डालियों ने बरोहें* मेरी आँखों की थाह तक
डंठल... डंठल का स्पर्श है अभी
पत्ते... पत्तों की टुनगियाँ कह रही हैं ज़मीन से दूर हटो दूर हटो
और कहती हैं नीचे बना दो खोखल, सहा नहीं जाता।
उड़ जाने दो सारे पत्ते... भूरे सारे
बनाकर खत्ता दसों दिशाओं का एक, उसकी ओर
बनकर ओठों की सीटी निढालपने की, एक ही
छप जाने दो सारे अस्फुट इन डंठलों-डंठलों में
एक ही पेड़ के इस पतझड़ से भर जाने दो
सारा फ़ासला होने और है के बीच का तेरे और मेरे
पत्ते नहीं होंगे और लगेंगे ढेर
टूटकर झरने वाले इन पत्तों के भूरे।
आँखें जन्मांध की संचित कर रखती हैं घेरे पृथ्वी को तौलनेवाले अँधेरे के
उतने ढेर करूँगा जमा, आँखों की गहराई में लेते हुए बरोहों को
पिलाऊँगा अपनी अंजुरी से तुम्हें वह बेला,
तब तक तो रुको। बैठो भींचकर अपनी हवाएँ, अपनी प्यास।
रहने दो पेड़ को यों आँखों की थाह में मेरी सिसकते हुए,
दूर हटो दूर हटो ज़मीन से कह रहे पत्ते
सँभालते हुए तैरते-डोलते मिट्टुओं के झुंड।
*बरोह : बरगद की जटाएँ








