गृहदेवी

बलराम शुक्लबलराम शुक्ल

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पत्नी के लिए

एक

उसका मुखड़ा
चाँद की तरह नहीं है
फिर भी
वह मेरे हृदय को आह्लादित करती है
उसकी आँखें
कमल की सुंदर नहीं हैं
फिर भी 
वे मेरे मन के भ्रमर को बरबस खींच लेती हैं

दो

उसकी केशराशि
रात की तरह नहीं है
फिर भी मेरा सपनीला संसार वहीं सुखपूर्वक सोता है
उसकी भौंहें भी
तलवार की तरह तीखी नहीं हैं
फिर भी, वे मेरे धीरज के कवच को
छिन्न-भिन्न कर देती हैं।

तीन

उसके मधुर अधरों में
बिम्बफल की लालिमा नहीं है
लेकिन मेरे जीवन के अरुण प्रभात के क्षितिज वे ही हैं
उसकी दंतपंक्ति में
मोतियों की चमक नहीं है
लेकिन मेरे घर में उजाला इन्हीं के दम से है 

चार

उसकी बातें 
स्वर्ग-लोक वाले अमृत की तरह नहीं हैं
लेकिन उन्हीं के संपर्क से मेरा हृदय एकाएक जी उठता है
उसका रंग
तपाए गए खरे सोने की भाँति नहीं है
फिर भी उसको पाकर मैं तीनों लोकों में सबसे समृद्ध हो गया हूँ

पाँच 

अत्यंत आनंदित करने वाले,
मधुर तथा मंद वचनों के चंदन से
निरंतर अंग-प्रत्यंगों को तृप्त करने वाली,
अपने कटाक्षपातों से अमृत को व्यर्थ बनाती हुई,
अपने सामान्य हाव-भावों से हृदय को अत्यधिक प्रसन्न करती हुई––

छह

प्रज्वलित अग्नि के साक्षी रहते,
पवित्र वैदिक ध्वनियों में डूबे वातावरण में,
नियति के आदेश से जिसके हाथों को हाथ में लिया मैंने
उस मेरी गृहदेवी के अतिरिक्त
और कौन मेरी नायिका हो सकती है?

बलराम शुक्ल
About the poet

बलराम शुक्ल

नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-लेखक और अनुवादक। संस्कृत और फ़ारसी साहित्य के अप्रतिम अध्येता। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ संस्कृत से स्वयं कवि द्वारा अनूदित।

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