मैंने ख़रगोश की तरह सोचा
और दौड़ पड़ा कछुए की तरह
टूटती, बिखरती और लिथड़ती
दुनिया को बचाने
पाँच कवि देवास से
पंद्रह इंदौर से
और अन्य शहरों के कवि भी हो लिए साथ
सारे कवि नारा लगाने वाले अंदाज़ में चिल्लाए
यह चिंता और घोर निराशा से भरा समय है
उज्जैन के एक कवि ने टोक दिया
और हम चले आए मुँह लटकाए
भाई लोगो! दिल्ली में सत्रह सौ साठ कवि हैं
और वहाँ का एक कवि यहाँ के सौ के बराबर।








