भदोही बस स्टैंड पर

बद्री नारायणबद्री नारायण5 Oct 1965

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बाँधे मुरेठा

सर में पंख खोंसे

खूँट में सुर्ती बाँधे

मारकीन का कुरता, अलमुनियम का लोटा

आम छाप बीड़ी और सतुए की रोटी

बाँधे गठरी में

कबीर खड़े थे भदोही बस स्टैंड पर

बस के इंतज़ार में!

यहाँ तो हद-बेहद दोनों चला गया

अब यहाँ रह कर क्या होगा

चलो और कहीं चलें।

ओस, धान की फुनकी, गेहूँ के पौधों की डाली की चमक

और नदी का पानी

जिन सबसे मैं गढ़ रहा था

एक सुंदर चाँद

सब नीलाम हो गया

यह बस अगर नहीं भी मिली तो क्या

चला ही चाऊँगा किसी और बस से

कंडक्टर ने अगर

टिकट का पैसा न होने के कारण

बस से उतार भी दिया तो क्या

चला जाऊँगा कहीं और

चिड़ियों के आवाज़ के पंखों पर

सवार,

चला जाऊँगा ग़ाज़ियाबाद

वहीं लगाऊँगा अपना ठौर

पर ग़ाज़ियाबाद में भी

जहाँ जाऊँगा बुनने-कातने

वह जगह, वह करघा भी

कोई न कोई ख़रीद रहा होगा,

कोई न कोई बेच रहा होगा

खंजड़ी की आवाज़ को मन में सुमिरते

सोचा कबीर ने

कोई बात नहीं

कहीं कुछ नहीं होगा

तो सूरत चला जाऊँगा

यह सोचते कबीर यह भूल गए थे कि

सहमत के अनहद नाद के बावजूद

वहाँ पिजाए जा रहे थे कई ख़ंजर

उनके इंतज़ार में

मैंने चिंतित हो जब उन्हें

यह बात याद दिलाई

तो उन्होंने उदासी भरे स्वर में कहा,

कोई बात नहीं

जब कहीं भी रहने नहीं दोगे

आप लोग 

तो जो चाँद मैं गढ़ रहा था

तुम लोगों के लिए

उसे लेकर मैं अमरपुर चला जाऊँगा

यह कह वे अजब बेचैनी से

अपने मारकीन की बंडी में

कुछ टटोलने लगे

मानो अपनी बगली में चाँद ढूँढ़ रहे हों।

बद्री नारायण
About the poet

बद्री नारायण

सुपरिचित कवि-विचारक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बद्री नारायण जन्म : 05/10/1965

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