जाति है कि जाती नहीं,
शर्म है कि आती नहीं
है दिए में तेल भी,
पर एक भी बाती नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
है पड़ा वो भूमि लथपथ,
ज़िंदा अभी है मारो झटपट
भीड़ तो आती है साथ,
पर आदमी एक लाती नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
पूछो इन वादियों से,
इन पुरानी घाटियों से
कर्मनाशा के मिलन से,
गंगा मर जाती नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
किस बात का दंभ है तुम्हें,
ये जाति क्या देगा तुम्हें?
तुम मंदिरों की दीवार उठाना,
घर में भले टाटी नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
बँटे हों जहाँ श्मशान तक,
ज़मीन-ओ-आसमान तक
जहाँ घड़े कुढ़ रहे घड़ों से,
वो एक देश की माटी नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
जाति बोने वालों का,
बीज मंत्र तो यही रहा
कि साँप गुड़ खाकर मरे
और टूटे मेरी लाठी नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
मत कहो कि मन साफ़ है,
समय के पास माप है
धर्म जाति की यह अफ़ीम,
किसने यहाँ चाटी नहीं?
जाति है कि जाती नहीं...
एक तरफ़ है धर्म-पताका,
एक तरफ़ है जाति-गाथा
इस तरह की दोग़ली गाड़ी,
हमसे खींची जाती नहीं।
जाति है कि जाती नहीं...
जाति है कि जाति नहीं...








