सपने में होना भी होना है होने जैसा

अशोक कुमार पांडेयअशोक कुमार पांडेय1 Jan 1975

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एक मुसलसल यात्रा के बीच मिली बापरवाह नींद में भी सपने आते हैं

सारी वजूहात हैं अवसाद में डूब जाने की

सारी वजूहात है तुम्हें आख़िरी सलाम कर चुपचाप कोई तीसरी क़सम खा लेने की

सारी वजूहात हैं मौत से पहले एक लंबी नींद में डूब जाने की

ऐसे हालात में तुम याद दिलाते हो वह अभिशप्त शब्द—मुख़ालिफ़त

वैसे इन दिनों एक यह भी तरीक़ा है कि इसकी जगह लिखा जाए ख़िलाफ़त

और चुपचाप किसी ख़लीफ़ा के दरबार में क़ब्ज़ा कर ली जाए कोई जगह।

उनका क़िस्सा और है हारना जिनकी क़िस्मत है मुख़ालिफ़त फ़ितरत

बेतार के तारों में उलझी कितनी ही आवाज़ें गूँजती हैं

कितने शब्द तैरते हैं सिलिकान शिराओं में दिन-रात

रोज़ कितने ही सवाल

कितने ही जवाब

कैसी आपाधापी

कैसी चुप

सच

झूठ

मीठे

कड़वे

आज मैं किसी ऐसे दोस्त के फ़ोन के इंतज़ार में हूँ जिसे अपनी उस पुरानी प्रेमिका की याद आ रही हो अचानक जिसे मैं जानता था। आज मैं एक शराबी शाइर का पाजामा पहनकर ऊँची आवाज़ में गाते हुए गुज़रना चाहता हूँ तुम्हारी गली से और किसी दोस्त की छत पर देखना चाहता हूँ अपने मष्तिष्क की नसों को बिखरते हुए रेशा-रेशा।

मैं किसी ग़लत ट्रेन में चढ़ गया हूँ शायद। या फिर जिस सीट पर बैठा हूँ वह नहीं है मेरी। जिन कपड़ों में है इन दिनों मेरी देह वह किसी लाश की देह से उतारे हुए हैं शायद और उनकी गंध ने हर ली है मेरी देह-गंध। मैं जिस घर में हूँ, उसमें कोई कमरा मेरा नहीं। जो कुछ सबका था, वह सब अब हुआ समाप्त। ले दे के सड़क ही बची है अंतिम शरणगाह, जहाँ बहुत भीड़ है और एक भयावह ख़ालीपन।

आज इस शब हो जाए वह सब जो होना है

शब-ए-क़यामत है कमबख़्त किसे सोना है

मैं नींद में नहीं हूँ स्वप्न में हो सकता हूँ। वह दीवार ज़मींदोज़ हो चुकी है जिसके उस पार स्वप्न थे और इस पार सच। मैं उस दीवार के मलबे में धँसा पाँव निकालने की कोशिश में लगी चोटों के दर्द के सहारे फ़र्क़ करता हूँ ख़्वाब और हक़ीक़त में और दोनों बहते से लगते हैं ख़ून की ताज़ा धार में।

होना इन दिनों दर्द की भाषा का एक विस्थापित शब्द है

मैं नीमबेहोशी में उठता हूँ और चलता हूँ तुम्हारी ओर

तुम इंकार कर दो मुझे पहचानने से

मैं ख़ुद के होने से इंकार करने आया हूँ तुम्हारे पास

यह वस्ल की शब है इसे अलग होना है शब-ए-हिज्राँ से

ख़्वाब पिन्हाँ हैं इस क़दर मेरी नफ़स में कि

अपने साये के क़फ़स से निकल आया हूँ…

अशोक कुमार पांडेय
About the poet

अशोक कुमार पांडेय

हिंदी कवि-कथाकार और अनुवादक। ‘कश्मीरनामा’ शीर्षक पुस्तक के लिए चर्चित। मूल नाम : अशोक कुमार पांडेय जन्म : 01/01/1975 | मऊ, उत्तर प्रदेश

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