सिरहाने मीर के

अरुण देवअरुण देव16 Sept 1972

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लाल क़िले के परकोटे

और जामा मस्जिद की सीढ़ियों से दूर

महबूब के दीवार के साये तले

टुक रोते-रोते सो गया है मीर

टूटे दिल और खुले चेहरे वाला वह शाइर

जिसकी आवाज़ अब भी भग्न महलों में गूँजती रहती है

जिसमें हिंदुस्तान की दूर तक पसरी धरती का ताँबाई रंग है

जहाँ गौरैया फुदकती है

मोर नाचते हैं

और आम रस से भरकर टपक जाते हैं

यह वही सूफ़ी है जिसके विरह के ताप से टूट कर गिर पड़ी थी कभी पूरी की पूरी शताब्दी

इतिहास के बाहर जिसका मलबा आज भी पसरा है

जहाँ से रह-रह दुरार्नियों के लश्कर के लौटते घोड़ों के टापों की आवाज़ें आती हैं

उजाड़ बस्तियों में दरवेश की तरह भटकती रहती है कोई पुकार

हर ईंट की ज़बान पर दुःख भरा एक क़िस्सा है

क्या पता...

समय का, सल्तनत का कि ख़ुद शाइर का

कसका खींचे उसे कितनी ही बार देवालय में देखा गया था

काबे और कैलास का रास्ता

तब इतना ज़ुदा नहीं दिखता

अगर कोई दिल के रास्ते चले

काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था

उसके शे'रों ने अपनी नाज़ुक अँगुलिओं से जो सवाल उठाए

उसकी चोट से निरुत्तर हो जाते थे कई बार शेख ओ' ब्रहम्न

जिस कवि के लिए पेड़ के साये का बोझ भी कई बार असह्य हो जाता

उसकी ज़बान ने अपने लिए ऐसे शब्द चुने जो अब्र की तरह

अर्थ की बंजर धरती पर बरस जाते थे

वह भाषा जो सिंधु को पार करके ख़ुद एक नदी थी

उस भाषा को भी क्या इल्म

कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फ़ाज़ कहीं

मायने कहीं और

अरुण देव
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अरुण देव

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    शिक्षा : जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय(नई दिल्ली) से एम.फिल.,पी.एच.डी. ,विश्व-विद्यालय अनुदान आयोग की फेलोशिप के अंतर्गत मोहन राकेश और आचार्य महावीरप्रसाद द्दिवेदी पर शोध कार्य, क्या तो समय (कविता-संग्रह) 2004 भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली, कुछ आलोचनात्मक लेख, संस्कृति,उपनिवेश और हिंदी आलोचना बहुवचन-८, राष्ट्र की अवधारणा, भारत का अतीत और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,बहुवचन-11,उपनिवेश और हिंदी का स्वरूप,बहुवचन -२५ ,Mahatma Gandi international Hindi University,Verdha....... हिंदी नवरत्न.

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