अन्तिम कविता - अरुण देव

अरुण देवअरुण देव16 Sept 1972

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गुलेल से फेंकी गईं कठोरताएँ
क्रूरताओं की बारिश में लौट रहीं हैं
 
कामनाओं के पहाड़ हैं पीठ पर लदे
यात्रा की थकान से टूट गए हैं कन्धे
निरर्थकताओं से भर गई है जिह्वा
कहीं भी कोई हरा पत्ता नहीं
कोई कीट नहीं परागण के लिए
 
संशय नहीं
निश्चितताओं की ईंटों से चुनी चहारदीवारी की तयशुदा ज़िन्दगी का
अब यह आख़िरी पहर
 
ओ ! नाव
जर्जर ही सही रेत में धँसी
सभ्यता के किसी और अर्थ की ओर ले चलो
 
तुमसे ही शुरू हुई थी यह यात्रा
अनिश्चित और उम्मीद से भरी
 
प्रलय की आग में झुलस गया है वृत्त
 
पृथ्वी से बाहर
उसके आकर्षण से परे
आकाशगंगा में
 
ले चलो कहीं ।
अरुण देव
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अरुण देव

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    शिक्षा : जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय(नई दिल्ली) से एम.फिल.,पी.एच.डी. ,विश्व-विद्यालय अनुदान आयोग की फेलोशिप के अंतर्गत मोहन राकेश और आचार्य महावीरप्रसाद द्दिवेदी पर शोध कार्य, क्या तो समय (कविता-संग्रह) 2004 भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली, कुछ आलोचनात्मक लेख, संस्कृति,उपनिवेश और हिंदी आलोचना बहुवचन-८, राष्ट्र की अवधारणा, भारत का अतीत और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,बहुवचन-11,उपनिवेश और हिंदी का स्वरूप,बहुवचन -२५ ,Mahatma Gandi international Hindi University,Verdha....... हिंदी नवरत्न.

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