इस अतृप्ति में कितनी तृप्ति है!

अर्पण कुमारअर्पण कुमार14 Sept 1977

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जी नहीं भरता

नदी का

संवाद-दर-संवाद से

प्रेम की परतदार बातों से

तुष्ट कहाँ होता है

सागर भी

सुनते हुए

नदी की विकल, विह्वल

और प्रवहमान आवाज़

यह अधीरता

दुनिया की

कितनी मनोहर

अधीरता है,

इस अतृप्ति में

कैसी तृप्ति है!

अर्पण कुमार
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अर्पण कुमार

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