जी नहीं भरता
नदी का
संवाद-दर-संवाद से
प्रेम की परतदार बातों से
तुष्ट कहाँ होता है
सागर भी
सुनते हुए
नदी की विकल, विह्वल
और प्रवहमान आवाज़
यह अधीरता
दुनिया की
कितनी मनोहर
अधीरता है,
इस अतृप्ति में
कैसी तृप्ति है!
जी नहीं भरता
नदी का
संवाद-दर-संवाद से
प्रेम की परतदार बातों से
तुष्ट कहाँ होता है
सागर भी
सुनते हुए
नदी की विकल, विह्वल
और प्रवहमान आवाज़
यह अधीरता
दुनिया की
कितनी मनोहर
अधीरता है,
इस अतृप्ति में
कैसी तृप्ति है!

भागु होआ गुरि संतु मिलाइिआ।।प्रभु अबिनासी घर महि पाइिआ।।
कोई तड़के सुबह तो कोईदिन चढ़े जगा है
आख़िर कब तक तुम हमें ठगतेऔर कोई कब तक चुप और निष्क्रिय
कितना कुछ टूट्ने लगता हैशरीर और मन के अन्दर
मैं कुछ नहीं हूँऔर अपने इस कुछ नहीं को