निरर्थक साधनाओं में क़ैद होता संसार
तुमको तलाशता सुदूर तीर्थों में
और मैं लिखती हूँ
तुम्हारी विस्तृत हथेली पर
वे तमाम प्रणय-गीत
जो मेरा ह्रदय गाता है।
व्यर्थ कर्मकांडों के वशीभूत होता संसार
तुम को ढूँढ़ता बेमतलब क्रियाओं में
और मैं निमग्न होती हूँ
उस चरमबिंदु पर
जहाँ आसन-रत हो
प्रेम ईश्वर हो जाता है।
अर्थहीन आडंबरों से आच्छादित होता संसार
तुमको देखता निर्जीव पाषाणों में
और मैं तन्मय होती हूँ
हृदय के उस घाट पर
जहाँ हिम-द्रवित हो
गंगा का उद्गम हो जाता है।
मिथ्या अर्चन से सम्मोहित होता संसार
तुमको पुकारता उन्मादी कोलाहल में
और मैं मल्हार रचती हूँ
अंतस के उस सभा-मंडल में
जहाँ घनगर्जित हो
जीवन स्वयंप्रभु हो जाता है।








