उपदेशसाहस्री / उपदेश ७

Aadi SankaracharyaAadi Sankaracharya

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उपदेशसाहस्री / उपदेश ७
बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं दृश्यते यत्र तत्र वा।
मया तस्मात् परं ब्रह्म सर्वज्ञश्चास्मि सर्वगः॥

यथामबुद्धिचाराणां साक्षी तद्वत् परेष्वपि।
नैवापोढुं न वादातुं शक्यस्तस्मात् परो ह्यहम्॥

विकारित्वमशुद्धत्वं भौतिकत्वं न चात्मनः।
अशेषबुद्धिसाक्षित्वाद् बुद्धिवच् चाल्पवेदना॥

मणौ प्रकाश्यते यद्वद् रक्ताद्याकारतातपे।
मयि संदृश्यते सर्वमातपेनेव तन् मया॥

बुद्धौ दृश्यं भवेद् बुद्धौ सत्यां नास्ति विपर्यये।
द्रष्टा यस्मात् सदा द्रष्टा तस्माद् द्वैतं न विद्यते॥

अविवेकात् पराभावं यथा बुद्धिरवेत् तथा।
विवेकात् तु परादन्यः स्वयं चापि न विद्यते॥

 

Aadi Sankaracharya
About the poet

Aadi Sankaracharya

आदि शंकराचार्य (५०८ ईसा पूर्व) भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। उन्होने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने…

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