एकांता

उस्मान ख़ानउस्मान ख़ान12 Jul 1984

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एकांता,

तुम्हीं करो नोट

मेरे विचार

तो बेहतर,

बेहतरीन और

अगर दोहरा दो केवल क्रम

कल्पनाओं-विचार-लहरों का

लिखते समय।

धूप नहीं,

चाँद नहीं,

नहीं प्रिया,

तुम पूरी की पूरी तुम,

तुम्हें उकेरना चाहता हूँ हिमालय की किसी

सूनी मज़बूत चट्टान पर—

ज़ख़्मों के मूर्त रूप वे

सोचे-समझे ढाले गए

नारों की तरह।

तुम अपनी अँधेरी गर्तों में

मुझे गुम कर दो,

मैं तुम्हारे अलावा और किसी का अस्तित्त्व

अब नहीं कर सकता बर्दाश्त।

पर तुम बड़े खोटे हो,

संवाद को शील-भंग मान बैठे हो,

हे तेजस्वी, महाआक्रांता!

गढ़-प्रवेश का प्रथम क्षण

तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है।

ये जन अब तुम्हारे जन हैं,

‘मेरे जन!’।

ये नदी अब तुम्हारी माता है,

ये पर्वत ही पिता।

ये नन्हे मनुष्य अब तुम्हें बड़ा करेंगे,

हर आकाश में।

ये खेत अब तुम्हारा पसीना माँगते हैं।

ये सड़कें तुम्हारे पैरों के निशान चाहती है।

ये सब तुम हो,

दुकानों में लटके हुए,

बसों में कुचले हुए,

पानी के लिए लड़ते हुए,

बे-इलाज मरते हुए,

तुम हो ये सब।

तुम पथ-भ्रांता!

उस्मान ख़ान
About the poet

उस्मान ख़ान

नई पीढ़ी के कवि-आलोचक। मूल नाम : उस्मान ख़ान जन्म : 12/07/1984 | मंदसौर, मध्य प्रदेश उस्मान ख़ान नई पीढ़ी के कवि-आलोचक हैं जो अपनी रचनात्मकता के साथ संयम से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मालवा के लोक–साहित्य पर पी.एच.डी. किया है और फ़ि…

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