साम्प्रदायिक दंगों के दिनों में

Usha Ghanshyam UpadhyayUsha Ghanshyam Upadhyay7 Jun 1956

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साम्प्रदायिक दंगों के दिनों में

यक्ष

मेरे शहर की
रोती आँख पोंछता पवन
इस वर्षा-ऋतु में अब
किस यक्ष का संदेश लेकर जाते हुए
मेघ का
सहचर बनेगा ?

हिंस्त्र-पशु

दिन में
किसी हिंस्त्र-पशु की तरह
आँखों में ख़ून भरे
चीते की तरह लपकता हुआ,
ज़ूनून से जबडा फाड़कर
कराल पंजा उठाता
मेरा यह शहर
रात को
शांत हो जाता है
हिचकी खाते-खाते
माँ की गोद में सो गए
बच्चे की तरह

'बौद्ध-भिक्षु


मेरे शहर के
भड़-भड़ जलते मकानों की
अंगार-राशि को भला
कल्पना-दरिद्र उस प्राकृत कवि ने
हाल में कहाँ देखा होगा ?

अन्यथा वह
फागुन में खिलकर
झर-झर झरकर
धरती पर बिछते
पलाश के फूलों को
बुद्ध के चरणों में
समर्पण करते भिक्षुओं की उपमा
कभी नहीं देता....


मूल गुजराती से अनुवाद : स्वयं कवयित्री द्वारा

 

Usha Ghanshyam Upadhyay
About the poet

Usha Ghanshyam Upadhyay

Usha Upadhyay. Usha Ghanshyam Upadhyay (born 7 June 1956) is Gujarati writer from Gujarat, India. She has been awarded Batubhai Umarwadiya Prize by Gujarati Sahitya Parishad, Bhagini Nivedita Prize and Sauhard Samman Puraskar by Uttar Pradesh Hindi Sansthan,…

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