पतन की अंतिम शिला पर

तुषार धवलतुषार धवल22 Sept 1973

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केंचुए-सी रेंगती है बदन पर

धूसर आग

मलिन कांति पर राख झाड़ कर

नाचता है बेताल

हूह उठती है सन्नाटे से

देह में कसा ब्रह्मांड

प्रलय की तरफ़ बढ़ता है

जिसका

स्याह-नीला हुस्न

चित्त पर थिरकता है

जकड़ता है अपने अष्टपाश में और

धीरे-धीरे मारता है

कुछ यूँ कि मरना भी रूमानी लगे

इतना कि

मृत्यु का रोमान ही जीवन का निरर्थ तोड़े

नाश के उत्तरकाल में विलाप है

नि:स्वर

सन्नाटे से कुचली छाती पर

निस्तेज प्रमाद की शव-छाया है

यह मध्य की अँधेरी सुरंग है जिसमें

तिरछा पड़ा पाँव टीसता है

अस्तित्व पर

माँगे नहीं मिलती है मौत

और मृत्यु उत्तर भी नहीं है

इस दिशा-भ्रम में

उत्तर यदि कुछ है

तो ख़ुद मैं हूँ

जो मिलेगा मुझे

ख़ुद को निष्ठुरता से

ढहा देने की ताक़त के उस पार।

तुषार धवल
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तुषार धवल

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