कुछ नहीं छोड़ेंगे ये एक दिन
इस पृथिवी पर
न वर्षा, न वसंत, न शरद, न शिशिर,
न ग्रीष्म और न हेमंत
कुछ बच पाना संभव ही नहीं घृणा और उदासी में।
नहीं बचेगा बचना भी इस विक्षोभ में।
न सावन की झूलती उमँगें
न भादों की हरी दूब का तिनका
न आसोज में घोड़े की हिनहिनाहट
न कातिक की पूर्णिमा
न ही बचेगी मिंगसर में
खिलती कपास की संभावना।
पौह में कहीं दूब पर नहीं बचेगी
ओस की एक बूँद भी
न माह में भू-फोड़ उगेगा
न माँ के स्नान के लिए बचेगी
इस पृथिवी पर कोई नदी।
कुछ भी नहीं छोड़ेंगे
न दोस्तों को मिलाने वाले फाग की मिठास
न चैत की चेतनता, न बैसाख़ में बचेगी
मुस्कुराने के लिए कोई कोंपल।
न जेठ में बचेगा
कहीं कोई गीला बादल।
बारहों महीनों में कहीं नहीं
बचेगी प्रेम में भीगी आवाज़
बस बचने को कुछ बचेगी
तो बची रहेगी
आषाढ़ के अंधड़ में अभिलाषा।








