अंधड़ में अभिलाषा

त्रिभुवनत्रिभुवन

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कुछ नहीं छोड़ेंगे ये एक दिन

इस पृथिवी पर

न वर्षा, न वसंत, न शरद, न शिशिर,

न ग्रीष्म और न हेमंत

कुछ बच पाना संभव ही नहीं घृणा और उदासी में।

नहीं बचेगा बचना भी इस विक्षोभ में।

न सावन की झूलती उमँगें

न भादों की हरी दूब का तिनका

न आसोज में घोड़े की हिनहिनाहट

न कातिक की पूर्णिमा

न ही बचेगी मिंगसर में

खिलती कपास की संभावना।

पौह में कहीं दूब पर नहीं बचेगी

ओस की एक बूँद भी

न माह में भू-फोड़ उगेगा

न माँ के स्नान के लिए बचेगी

इस पृथिवी पर कोई नदी।

कुछ भी नहीं छोड़ेंगे

न दोस्तों को मिलाने वाले फाग की मिठास

न चैत की चेतनता, न बैसाख़ में बचेगी

मुस्कुराने के लिए कोई कोंपल।

न जेठ में बचेगा

कहीं कोई गीला बादल।

बारहों महीनों में कहीं नहीं

बचेगी प्रेम में भीगी आवाज़

बस बचने को कुछ बचेगी

तो बची रहेगी

आषाढ़ के अंधड़ में अभिलाषा।

त्रिभुवन
About the poet

त्रिभुवन

सुपरिचित कवि-लेखक और पत्रकार।

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