सुनत नगारे चोट बिगसै कमलमुख

SunderdasSunderdas1 Jan 1596 – 1 Jan 1689

1 min read · 12.7K reads

सुनत नगारे चोट बिगसै कमलमुख,
अधिक उछाह फूल्यो मात है न तन में.
फेरै जब साँग तब कोऊ नहीं धीर धरै,
कायर कँपायमान होत देखि मन में .
कूदि के पतंग जैसे परत पावक माहि,
ऐसे टूटि परै बहु सावंत के गन में .
मारि घमासान करि सुंदर जुहरे श्याम,
सोई सूरबीर रुपि रहै जाय रन में.

Sunderdas
About the poet

Sunderdas

Sunderdas (1596–1689) was a noted saint, poet, philosopher and social reformer of medieval India. He was a disciple of Dadu Dayal. Sunderdas was born in Dausa in Rajasthan state in India. Sant Sunderdas composed about 48 books. He is revered as the Sankaracha…

View profile & all 8 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानादोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुईदोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुईतस्वीर तेरे घर में थी मेरी लगी हुई— मुनव्वर रानापॉलिथीन की थैलियाँ चारसामान लाने गया था बाज़ारआ गईं साथ में पॉलिथीन की थैलियाँ चार— हरि मृदुलतो कैसा रहेआदमी की तुलना पतंग सेऔर जीवन की तुलना डोर से की जाए— हरि मृदुल