चरन धूर निज सिर धरो, सरन गुरु की लेय

Shivadin Ram JoshiShivadin Ram Joshi10 Jun 1921 – 27 Jul 2006

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चरन धूर निज सिर धरो, सरन गुरु की लेय,
तीन लोक की सम्पदा, सहज ही में गुरु देय |
सहज ही में गुरु देय चित्त में हर्ष घनेरा ,
शिवदीन मिले फल मोक्ष, हटे अज्ञान अँधेरा |
ज्ञान भक्ति गुरु से मिले, मिले न दूजी ठौर,
याते गुरु गोविन्द भज, होकर प्रेम विभोर |
राम गुण गायरे ||

और न कोई दे सके, ज्ञान भक्ति गुरु देय,
शिवदीन धन्य दाता गुरु, बदले ना कछु लेय |
बदले ना कछु लेय कीजिये गुरु की सेवा,
जन्मा जन्म बहार, गुरु देवन के देवा |
गुरु समान तिहूँ लोक में,ना कोई दानी जान,
गुरु शरण शरणागति, राखिहैं गुरु भगवान |
राम गुण गायरे ||

समरथ गुरु गोविन्दजी, और ना समरथ कोय,
इक पल में, पल पलक में, ज्ञान दीप दें जोय |
ज्ञान दीप दें जोय भक्ति वर दायक गुरुवर,
गुरु समुद्र भगवन, सत्य गुरु मानसरोवर |
शिवदीन रटे गुरु नाम है,गुरुवर गुण की खानि,
गुरु चन्दा सम सीतल, तेज भानु सम जानि |
राम गुण गायरे ||

Shivadin Ram Joshi
About the poet

Shivadin Ram Joshi

शिवदीन राम जोशी (जन्म : १० जून १९२१, खंडेला, सीकर जिला) एक भारतीय कवि थे। उनके साहित्य में सवैया, मनहर, मतगयंद, कुंडली छंद और कवित्त का प्रयोग तथा धमाल, भजन और गजलों का समावेश है। पद्यात्मक रचनाओं का विषय ज्ञान, वैराग्य, प्रेम, प्रकृति चित्रण, प्रार्थना और उप…

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