अर्जुन दग्ध कियो वन खाण्डव,
जाय यो काज तो तुच्छ सरायो ।
केसरी पुत्र कछु न करी अहो !
स्वर्ण की लंक को जाय जरायो ।
त्रिभुवन नाथ मदन को जारि के,
लोक आनन्द को दूर दुरायो ।
सब जन के मन में ताप करे,
रे ! दारिद्र को जारन को नहीं आयो ।
अर्जुन दग्ध कियो वन खाण्डव,
जाय यो काज तो तुच्छ सरायो ।
केसरी पुत्र कछु न करी अहो !
स्वर्ण की लंक को जाय जरायो ।
त्रिभुवन नाथ मदन को जारि के,
लोक आनन्द को दूर दुरायो ।
सब जन के मन में ताप करे,
रे ! दारिद्र को जारन को नहीं आयो ।

शिवदीन राम जोशी (जन्म : १० जून १९२१, खंडेला, सीकर जिला) एक भारतीय कवि थे। उनके साहित्य में सवैया, मनहर, मतगयंद, कुंडली छंद और कवित्त का प्रयोग तथा धमाल, भजन और गजलों का समावेश है। पद्यात्मक रचनाओं का विषय ज्ञान, वैराग्य, प्रेम, प्रकृति चित्रण, प्रार्थना और उप…
View profile & all 18 Poems / Storiesकोउ विधि मोहन का बन जाऊँ ।मोहन मेरा मैं मोहन का, प्रेम से गुण नित गाऊँ ।
चला चल मन तू ब्रज की ओर ।जहां गोपियां राधा संग में, नांचे नन्दकिशोर ।।
मोहन खेल रहे है होरी ।गुवाल बाल संग रंग अनेकों, धन्य-धन्य यह होरी ।
बरसत मिहरा आया श्रावन ।अमृत बरसा, बरसत रिमझिम, धरा हो गई पावन ।
वेद पुराण गुरु छवूँ शास्त्र, राम रामायण सत्य है नाता ।गीता का ज्ञान व ज्ञान गुरु, श्रुति न्याय व सूत्र गुरु समझाता ।