ऐ हम-नफ़साँ - नज़्म

शफ़ीक़ फातिमा शेराशफ़ीक़ फातिमा शेरा

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बुलडोज़र क़दमों से चलती

कॉलोनी बकतर-बंद नई

बेहद तौसीअ' के सहरा में

क्या सूँघ रही है सूंड उठाए

आदम बू

आँखें पलकें झपकाते रहने पर मामूर उस की

बे-वक़्फ़ा-ए-ख़्वाब

सिगनल की बत्ती जलती बुझती सदा

दिन हो या रात

सनसनी-ज़दा हर खटके पर आ'साब

शाहिद आ ही गया

आने वाला यौम-ए-हिसाब

हर्बा में ख़ुद अपने

मुहारिब का

यूँ ढल जाना

ख़ुद को खो कर ग़लबा पाना

ऐ दीदा-ए-इबरत-बीं

एक तुर्फ़ा-तमाशा है

मसनूई मशीनी दुनिया में

मसनूई मशीनी जीत और हार

जब तक तुम तुम हो

कुछ नहीं खोया हम ने

ऐ हम-नफ़सान-ए-जफ़ा-दीदा

ऐ हम-नफ़सान-ए-हज़ीं

जब तक तुम तुम हो

आदम-ज़ाद यहाँ

हर जब्र के मद्द-ए-मुक़ाबिल है

सरमस्त अज़ल आज़ाद

ख़ुश-बाश निडर पाकीज़ा निहाद

तुम आलम-ए-ख़्वाब के बाज़ अश्हब

किबरियत-ए-अहमर नायाब

फिर भी धारा सा तुम्हारे दम से

चाहत के अरमानों का

बहता रहता है दिलों में

तुम्हारे होते

रेज़ा-रेज़ न हो पाएँगी यहाँ

हुस्न-ओ-ख़ूबी की ये ता'बीरात

सुहानी उजली ता'मीरात

बा-रौनक़ जिन से

शर्क़-ओ-ग़र्ब ये बज़्म-ए-जिहात

शफ़ीक़ फातिमा शेरा
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शफ़ीक़ फातिमा शेरा

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