मैं देना चाहता हूँ तुम्हें

ओम नागरओम नागर20 Sept 1980

1 min read · 12.4K reads

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें

एक चम्मच नदी, एक क़तरा धूप, थोड़ी-सी छाँव

बस! काफ़ी है तुम्हें

पनपने और खिलने के लिए

पर तुम हो कि सूखना चाहते

मिटाना चाहते हो अपने वजूद को

भूल रहे हो कि टूटकर भी तो

गिरना ज़मीन पर ही है

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें

मुट्ठी भर आकाश

दो गज़ ज़मीन, चंद क़दमों तक हौसला

बस! काफ़ी है तुम्हें

उड़ने और उतरने कि लिए

पर तुम हो कि जड़ बना पालना चाहते हो

उस पेड़ को जिसके पत्ते

तेरे आने से पूर्व ही बिछ गए राह में

अपना अस्तित्व मिटा

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें

निर्मल झील

झरने का बहता पानी, जलचरों के झुंड

बस काफ़ी है तुम्हें

मन बहलाने कि लिए

पर तुम हो कि सागर से शांत, स्तब्ध

ग़मों का खारापन ले नापना चाहते हो

वेदना की गहराई को

जिसमें सिर्फ़ उतरना ही उतरना है मीलों तक

मैं देना चाहता हूँ

तुम्हें थोड़ी-सी हिम्मत

थोड़ा-सा विश्वास, थोड़ा-सा हठ

बस! काफ़ी है तुम्हें

अपने जैसा बनाने के लिए।

ओम नागर
About the poet

ओम नागर

View profile & all 51 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like