ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत

मीर तक़ी मीरमीर तक़ी मीर

1 min read · 12.4K reads

ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत

दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत

जब न तब जागह से तुम जाया किए

हम तो अपनी ओर से आए बहुत

दैर से सू-ए-हरम आया न टुक

हम मिज़ाज अपना इधर लाए बहुत

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे

पर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत

गर बुका इस शोर से शब को है तो

रोवेंगे सोने को हम-साए बहुत

वो जो निकला सुब्ह जैसे आफ़्ताब

रश्क से गुल फूल मुरझाए बहुत

'मीर' से पूछा जो मैं आशिक़ हो तुम

हो के कुछ चुपके से शरमाए बहुत

मीर तक़ी मीर
About the poet

मीर तक़ी मीर

View profile & all 51 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like