सर्दी के दिनों में जो प्रेम

Manglesh DabralManglesh Dabral16 May 1948

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सर्दी के दिनों में जो प्रेम शुरू हुआ
वह बहुत सारे कपड़े पहने हुए था
उसे बार-बार बर्फ़ में रास्ता बनाना पड़ता था
और आग उसे अपनी ओर खींचती रहती थी
जब बर्फ़ पिघलना शुरू हुई तो वह पानी की तरह
हल्की चमक लिए हुए कुछ दूर तक बहता हुआ दिखा
फिर अप्रैल के महीने में ज़ऱा-सी एक छुवन
जिसके नतीज़े में होंठ पैदा होते रहे
बरसात के मौसम में वह तरबतर होना चाहता था
बारिशें बहुत कम हो चली थीं और पृथ्वी उबल रही थी
तब भी वह इसरार करता चलो भीगा जाए
यह और बात है कि अक्सर उसे ज़ुकाम जकड़ लेता
अक्टूबर की हवा में जैसा कि होता है
वह किसी टहनी की तरह नर्म और नाज़ुक हो गया
जिसे कोई तोडऩा चाहता तो यह बहुत आसान था
मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि यह प्रेम है
पतझड़ के आते ही वह इस तरह दिखेगा
जैसे किसी पेड़ से गिरा हुआ पीला पत्ता।

Manglesh Dabral
About the poet

Manglesh Dabral

Manglesh Dabral is a prominent contemporary Indian poet who writes in Hindi. He was born in the village of Kaphalpani, Tehri Garhwal, Uttarakhand, completed his education in Dehradun. He has served in Hindi Patriot, Pratipaksh and Aaspaas in Delhi. Books: - H…

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