मैं अपने से डरती हूँ सखि

Makhanlal ChaturvediMakhanlal Chaturvedi4 Apr 1889

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मैं अपने से डरती हूँ सखि !

पल पर पल चढ़ते जाते हैं,
पद-आहट बिन, रो! चुपचाप
बिना बुलाये आते हैं दिन,
मास, वरस ये अपने-आप;
लोग कहें चढ़ चली उमर में
पर मैं नित्य उतरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !

मैं बढ़ती हूँ? हाँ; हरि जानें
यह मेरा अपराध नहीं है,
उतर पड़ूँ यौवन के रथ से
ऐसी मेरी साध नहीं है;
लोग कहें आँखें भर आईं,
मैं नयनों से झरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !

किसके पंखों पर, भागी
जाती हैं मेरी नन्हीं साँसें ?
कौन छिपा जाता है मेरी
साँसों में अनगिनी उसाँसें ?
लोग कहें उन पर मरती है
मैं लख उन्हें उभरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि  !

सूरज से बेदाग, चाँद से
रहे अछूती, मंगल-वेला,
खेला करे वही प्राणों में,
जो उस दिन प्राणों पर खेला,
लोग कहें उन आँखों डूबी,
मैं उन आँखों तरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !

जब से बने प्राण के बन्धन,
छूट गए गठ-बन्धन रानी,
लिखने के पहले बन बैठी,
मैं ही उनकी प्रथम कहानी,
लोग कहें आँखें बहती हैं;
उनके चरण भिगोने आयें,
जिस दिन शैल-शिखिरियाँ उनको
रजत मुकुट पहनाने आयें,
लोग कहें, मैं चढ़ न सकूँगी-
बोझीली; प्रण करती हूँ सखि !

मैं नर्मदा बनी उनके,
प्राणों पर नित्य लहरती हूँ सखि !
मैं अपने से डरती हूँ सखि !

Makhanlal Chaturvedi
About the poet

Makhanlal Chaturvedi

Pandit Makhanlal Chaturvedi (4 April 1889 – 30 January 1968), also called Pandit ji, was an Indian poet, writer, essayist, playwright and a journalist who is particularly remembered for his participation in India's national struggle for independence and his c…

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