मैं नीर भरी दुख की बदली!

Mahadevi VermaMahadevi Verma26 Mar 1907

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मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
Mahadevi Verma
About the poet

Mahadevi Verma

Mahadevi Verma was a Hindi poet, freedom fighter and educationist from India. She is widely regarded as the "modern Meera". She was a major poet of the "Chhayavaad", a literary movement of romanticism in modern Hindi poetry ranging from 1914–1938 and a promin…

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