पति!
एक दिन
तुम्हारा ही अनुगमन करते हुए
मैं उन घटाटोप अँधेरे रास्तों पर भटक गई
निष्ठा के गहरे गह्वर में छिपे आकर्षण के साँप ने
मुझे भी डस लिया था
उसके विष का गुणधर्म वैसा ही था
जो पति-पत्नी की बीच विरक्ति पैदा कर दे
इतनी
कि दोनों एक-दूसरे के मरने की कामना करने लगें
तभी जान पाई मैं कि क्या अर्थ होता है ज़ायक़ा बदल लेने का
और विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख छिपा होता है
और तुम क्यों और कहाँ चले जाते हो बार-बार मुझे छोड़कर
मैं तुम्हारे बच्चों की माँ थी
कुल बढ़ाने वाली बेल
और अर्धांगिनी
तुम लौट आए भीगे नैनों से हाथ जोड़ खड़े रहे द्वार
तुम जानते थे तूम्हारा लौटना मेरे लिए वरदान होगा
और मैं इसी की प्रतीक्षा में खड़ी मिलूँगी
मेरे और तुम्हारे बीच
फन फैलाए खड़ा था कालिया नाग
और इस बार
मैं चख चुकी थी स्वाद उसके विष का
यह जानने के बाद
तुम थे पशु...
मैं वेश्या दुराचारिणी...
ओ प्रेमी!
भटकते हुए जब मैं पहुँची तुम्हारे द्वार
तुमने फेंका फंदा
वृंदावन की सँकरी गलियों के मोहपाश का
जिनकी आत्मीयता में खोकर
मैंने सपनों के निधिवन को बस जाने दिया था घर की देहरी के बाहर
गर्वीली नई धरती पर प्यार की फ़सलों का वैभव फूट रहा था
तुमने कहा
राधा!
राधा ही हो तुम...
और प्रेम पाप नहीं...
जब-जब
पति से प्रेमी बनता है पुरुष
पाप-पुण्य की परिभाषा बदल जाती है
देह आत्मा
और स्त्री
वेश्या से राधा बन जाती है।








