पाँत के नियम

लवली गोस्वामीलवली गोस्वामी

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मैंने मोहल्लों को देखा वे बेतरतीब घरों से अटे पड़े थे

शहर अटे पड़े थे अव्यवस्थित मुहल्लों से

जबकि क़ब्रगाह में मुर्दा शरीरों पर लगे

पत्थरों की तरतीबी पसरी हुई थी

मैंने देखा ज़िंदापन कभी ढाँचे में नहीं बँधता है

ज़िंदापन नहीं मानता कभी पाँत का कोई भी नियम

तभी शायद कला के इतिहास में कविता का शिल्प

हमेशा बेतरतीब रहा है

नहीं बन पाई कविता की कोई ऐसी शैली

जिसे अंतिम कहा जा सके।

लवली गोस्वामी
About the poet

लवली गोस्वामी

नई पीढ़ी की कवयित्री। ‘प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता’ शीर्षक पुस्तक उल्लेखनीय। जन्म : धनबाद, झारखंड लवली गोस्वामी का जन्म 5 जनवरी 1987 को हुआ। वह मूलतः दर्शन और मिथक शास्त्र की स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं कवयित्री हैं। कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित उनकी पुस्तक '…

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