बंजारा

Javed AkhtarJaved Akhtar17 Jan 1945

3 min read · 19.8K reads

मैं बंजारा

वक़्त के कितने शहरों से गुज़रा हूँ

लेकिन

वक़्त के इस इक शहर से जाते जाते मुड़ के देख रहा हूँ

सोच रहा हूँ

तुम से मेरा ये नाता भी टूट रहा है

तुम ने मुझ को छोड़ा था जिस शहर में आ कर

वक़्त का अब वो शहर भी मुझ से छूट रहा है

मुझ को विदाअ करने आए हैं

इस नगरी के सारे बासी

वो सारे दिन

जिन के कंधे पर सोती है

अब भी तुम्हारी ज़ुल्फ़ की ख़ुशबू

सारे लम्हे

जिन के माथे पर रौशन

अब भी तुम्हारे लम्स का टीका

नम आँखों से

गुम-सुम मुझ को देख रहे हैं

मुझ को इन के दुख का पता है

इन को मेरे ग़म की ख़बर है

लेकिन मुझ को हुक्म-ए-सफ़र है

जाना होगा

वक़्त के अगले शहर मुझे अब जाना होगा

वक़्त के अगले शहर के सारे बाशिंदे

सब दिन सब रातें

जो तुम से ना-वाक़िफ़ होंगे

वो कब मेरी बात सुनेंगे

मुझ से कहेंगे

जाओ अपनी राह लो राही

हम को कितने काम पड़े हैं

जो बीती सो बीत गई

अब वो बातें क्यूँ दोहराते हो

कंधे पर ये झोली रक्खे

क्यूँ फिरते हो क्या पाते हो

मैं बे-चारा

इक बंजारा

आवारा फिरते फिरते जब थक जाऊँगा

तन्हाई के टीले पर जा कर बैठूँगा

फिर जैसे पहचान के मुझ को

इक बंजारा जान के मुझ को

वक़्त के अगले शहर के सारे नन्हे-मुन्ने भोले लम्हे

नंगे पाँव

दौड़े दौड़े भागे भागे आ जाएँगे

मुझ को घेर के बैठेंगे

और मुझ से कहेंगे

क्यूँ बंजारे

तुम तो वक़्त के कितने शहरों से गुज़रे हो

उन शहरों की कोई कहानी हमें सुनाओ

उन से कहूँगा

नन्हे लम्हो!

एक थी रानी

सुन के कहानी

सारे नन्हे लम्हे

ग़मगीं हो कर मुझ से ये पूछेंगे

तुम क्यूँ इन के शहर न आईं

लेकिन उन को बहला लूँगा

उन से कहूँगा

ये मत पूछो

आँखें मूँदो

और ये सोचो

तुम होतीं तो कैसा होता

तुम ये कहतीं

तुम वो कहतीं

तुम इस बात पे हैराँ होतीं

तुम उस बात पे कितनी हँसतीं

तुम होतीं तो ऐसा होता

तुम होतीं तो वैसा होता

धीरे धीरे

मेरे सारे नन्हे लम्हे

सो जाएँगे

और मैं

फिर हौले से उठ कर

अपनी यादों की झोली कंधे पर रख कर

फिर चल दूँगा

वक़्त के अगले शहर की जानिब

नन्हे लम्हों को समझाने

भूले लम्हों को बहलाने

यही कहानी फिर दोहराने

तुम होतीं तो ऐसा होता

तुम होतीं तो वैसा होता

Javed Akhtar
About the poet

Javed Akhtar

Javed Akhtar (born 17 January 1945) is an Indian political activist, poet, lyricist and screenwriter, originally from Gwalior area. He is a recipient of the Padma Shri (1999), Padma Bhushan (2007), the Sahitya Akademi Award as well as five National Film Award…

View profile & all 25 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डीमेरा और मेरी पृथ्वी का(लंबी कविता के कुछ अंश)वैसा ही हूँ, दुख मेरी गोद का बच्चा, बार-बार— हीरेन भट्टाचार्यतालाब-1मैं क्षिति तल परतुम्हारे सुख-दुख का— ब्रजरतन जोशी