लद्दू घोड़े

हरीशचंद्र पांडेहरीशचंद्र पांडे28 Sept 1952

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अछोर समय को लादे अपनी पीठ पर

लद्दू घोड़े चर रहे हैं

उनके गले में बँधी घंटियाँ

ज़िरह कर रही हैं आपस में

इतिहास में कहाँ खड़े हैं लद्दू घोड़े

लद्दू घोड़े अपनी पीठ के ज़ख़्म पर बैठी

मक्खियों को भगाने के लिए

पूरी पीठ बरकाते हैं

जिन पीठों को देखकर फिसल जाती हैं आँखें

जिनमें बैठकर मृगया के लिए निकलते हैं राजपुरुष

उन्हीं पीठों का वरण किया है इतिहास ने

लद्दू घोड़े मंथर गति से चलते रहे युगों

पीठ पर लादे स्तूप, शिलालेख, मूर्तियाँ, गुंबद

उन पर लदकर आया पूरा गांधार

उन पर लद कर गई पूरी दिल्ली

अस्तबलों में कहाँ थी उनकी जगह पता नहीं

पर बे-यात्रा के पड़ावों और युद्ध-शिविरों में

सम्राटों से दो दिन पहले मौजूद थे

अपने सैनिकों के लिए लिए हुए रसद

और जीवन-रक्षक औषधियाँ

वे अंत तक मौजूद थे

पर कहीं नहीं थे वे इतिहास में

जबकि किसी भी स्वर्णयुग की कल्पना

बिना ज़ख़्मी पीठों के संभव नहीं

गले में लटकाए चने की थैली

और पीठ पर सोना-चाँदी लादे

बीच यात्रा में

किसी मोड़ पर चूक गए लद्दू घोड़े

इतिहास में दर्ज थे

कूच करने के आदेश

हरीशचंद्र पांडे
About the poet

हरीशचंद्र पांडे

नवें दशक में सामने आए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि। अपने काव्य-विषयों, धैर्य और सादगी के लिए उल्लेखनीय मूल नाम : हरीशचंद्र पांडे जन्म : अल्मोड़ा, उत्तराखंड हरीशचंद्र पांडे का जन्म उत्तराखंड से अल्मोड़ा में 28 दिसंबर 1952 को हुआ। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से स्कूली शिक…

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