धरती पर पाँव नहीं रोप पाती थीं
चार क़दम चलना हो तो छह बार गिरती थीं
न जाने कैसी तो थीं औरतें
दुर्गा, काली के रूप में पूजी जाती थीं
मगर धरती पर सीता की नियति ही पाती थीं
माथे पर पति
और बच्चों की ज़िंदगी
आँखों में समुद्र
और छाती में अमृत ढोए चलती थीं
मगर ख़ुद दिन में सौ-सौ बार मरती थीं
नाराज़ होना
मना था इनके लिए
होतीं तो ग़ुस्सा
चूल्हे और बर्तनों पर उतारती थीं
देख न ले कोई पराया मर्द
घूँघट से ढँककर रखती थीं चेहरा
वैसे कोई किस्सा वैशाली की
नगरवधू का भी है पर
आज चौखट से बाहर
रास्ते पर उतरी हैं औरतें
मर्दों से आँखें मिला रहीं हैं
औरतें
घेर रही हैं विधानसभा
हवा में उड़ रही हैं
ज़मीन पर दौड़ रही हैं
उड़नखटोला उड़ा रही हैं
नारे लगा रही हैं
राज चला रही हैं
क्या से क्या हो रही हैं औरतें
आँख निकल रही है ग़ुस्साए मर्दों की...








