बल खाती बहती नदियों के मुहाने तक जाऊँगी मैं
तुम्हें ढूँढ़ते हुए
विनती-अरदास करती यहाँ-वहाँ डोलूँगी मैं
तुम्हें ढूँढ़ते हुए
ढूँढूँगी मैं तुम्हें चैंबेली की कुंजों में,
मत कहो, दुबारा अब मिलना नहीं होगा।
पीले गुलाब के झाड़ों पर फूल मुस्कुरा रहे
मेरी भी कलियाँ फूल बनने को कसमसा रहीं,
दरसन की प्यासी इन अँखियों को
और न तरसाओ—
मत कहो, दुबारा अब मिलना नहीं होगा।








