अनुपम छविवारे, ओ मेरे प्यारे,
ललक रहे हैं
मेंहदी-रचे मेरे हाथ
तुम्हें सहलाने को,
तड़फ रही हूँ
तुम्हारी रतनारी झलक
एक पाने को!
आओ, बुझाओ प्यारे, मेरी अबुझ प्यास
कैसे कटें तुम बिन ये बंजर दिवस-मास!
अनुपम छविवारे, ओ मेरे प्यारे,
ललक रहे हैं
मेंहदी-रचे मेरे हाथ
तुम्हें सहलाने को,
तड़फ रही हूँ
तुम्हारी रतनारी झलक
एक पाने को!
आओ, बुझाओ प्यारे, मेरी अबुझ प्यास
कैसे कटें तुम बिन ये बंजर दिवस-मास!

बल खाती बहती नदियों के मुहाने तक जाऊँगी मैंतुम्हें ढूँढ़ते हुए
दूऊऊर चरागाहों पर बहार उतर आई हैतुमने क्या मेरी पुकार नहीं सुनी?
भौंहौं से पसीने के मोती टपकातीमैं मालिन अलबेली बनफ़्शे के फूल चुनती।
क्या रिश्ता रहा भला ज़िंदगी सेठुकरा दिया है जब उसने मुझे!