अहिंसा

भारतभूषण अग्रवालभारतभूषण अग्रवाल

1 min read · 12.4K reads

खाना खाकर कमरे में बिस्तर पर लेटा

सोच रहा था मैं मन ही मन : ‘हिटलर बेटा

बड़ा मूर्ख है, जो लड़ता है तुच्छ-क्षुद्र मिट्टी के कारण

क्षणभंगुर ही तो है रे! यह सब वैभव-धन।

अंत लगेगा हाथ न कुछ, दो दिन का मेला।

लिखूँ एक ख़त, हो जा गांधी जी का चेला

वे तुझ को बतलाएँगे आत्मा की सत्ता

होगी प्रकट अहिंसा की तब पूर्ण महत्ता।

कुछ भी तो है नहीं धरा दुनिया के अंदर।'

छत पर से पत्नी चिल्लाई : “दौड़ो, बंदर?”

भारतभूषण अग्रवाल
About the poet

भारतभूषण अग्रवाल

अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ के कवि। जन्म : 02/08/1919 | मथुरा, उत्तर प्रदेश निधन : 23/06/1975 | शिमला, हिमाचल प्रदेश ‘तार सप्तक’ के कवि भारतभूषण अग्रवाल का जन्म 3 अगस्त, 1919 को तुलसी-जयंती के दिन उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के सतघड़ा मोहल्ले में हुआ। उन…

View profile & all 16 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like