हमने सौंप दिए हैं
अपने गौरव के तमाम पंख
और युद्धबंदियों की तरह
चले जा रहे हैं चुपचाप
सिर झुकाए हुए
चूती हुई छप्परों और झमाझम नारों के बीच
बंधुआ मजदूर की तरह विवश
ढो रहे हैं अपने ही अपमान की गठरी
कभी इस या कभी उस
निवेशक को यूँ तकते हैं जैसे वही हो हमारा मुक्तिदाता
अंधे कुएँ का पता जेब में लिए सर्जना के काग़ज़ी घोड़ों पर सवार
हम तीरंदाज़ी का अभ्यास कर रहे हैं
यह और बात है कि
धनुष हमारे हाथों में नहीं है
और तरकश
न जाने कबसे ख़ाली पड़े हैं।








