प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती,
शायद लुट जाए यह मेरी मुसाफ़िरी की थाती!
पथ सुनसान, कँटीला, टेढ़ा, पथरीला, अज्ञात,
मंज़िल लंबी, भ्रमित पथिक, मग में छायी चिर रात;
शिथिल गात, हो रहे अनेकों विकट घात-प्रतिघात,
किससे कहे मुसाफ़िर अपने मन की आकुल बात?
कुसमय में लप-झप करने लग गयी ज्योति अकुलाती,
प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती!
तुम प्रकाशपति, तुम दिन-मणि-पति सतत-सनातन ज्योतिपते!
संशय-दाहक अनल-प्रवाहक, हे जगपावक अग्निमते!
निज प्रचंड किरणांगुलियों से उकसा दो मेरी बाती,
फिर से इसे बना दो प्रिय तुम अग्नि-अरुण-धुन मदमाती।








