मंद ज्योति

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

1 min read · 12.4K reads

प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती,

शायद लुट जाए यह मेरी मुसाफ़िरी की थाती!

पथ सुनसान, कँटीला, टेढ़ा, पथरीला, अज्ञात,

मंज़िल लंबी, भ्रमित पथिक, मग में छायी चिर रात;

शिथिल गात, हो रहे अनेकों विकट घात-प्रतिघात,

किससे कहे मुसाफ़िर अपने मन की आकुल बात?

कुसमय में लप-झप करने लग गयी ज्योति अकुलाती,

प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती!

तुम प्रकाशपति, तुम दिन-मणि-पति सतत-सनातन ज्योतिपते!

संशय-दाहक अनल-प्रवाहक, हे जगपावक अग्निमते!

निज प्रचंड किरणांगुलियों से उकसा दो मेरी बाती,

फिर से इसे बना दो प्रिय तुम अग्नि-अरुण-धुन मदमाती।

बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

View profile & all 42 Poems / Stories

More from बालकृष्ण शर्मा नवीन

  1. विप्लव गायन - बालकृष्ण शर्मा नवीन

    ==जन्म ==हिंदी साहित्य में प्रगतिशील लेखन के अग्रणी कवि पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन का जन्म सन् १८९७ में ग्वालियर जनपद के अर्न्तगत शुजालपुर गाँव में हुआ।

    12.4K reads
  2. असिधारा पथ - बालकृष्ण शर्मा नवीन

    ओ असिधारा-पथ के गामी!विकट सुभट तुम, अथक पथिक तुम कंटक-कीर्णित मग-अनुगामी

    12.5K reads
  3. ओस बिंदु सम ढरके - बालकृष्ण शर्मा नवीन

    हम तो ओस-बिंदु सम ढरकेआए इस जड़ता में चेतन तरल रूप कुछ धर के!

    12.5K reads
  4. प्राप्तव्य - बालकृष्ण शर्मा नवीन

    इस धरती पर लाना है,हमें खींच कर स्वर्ग

    12.4K reads
  5. फागुन - बालकृष्ण शर्मा नवीन

    अरे ओ निरगुन फागुन मास!मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर वास,

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like