वह चौदह बरस की लड़की बहुत सतर्क है
मासिक धर्म के प्रति
वह सिर्फ़ इतना जानती है
कि जब यह प्रक्रिया रुकेगी तो होगी वह गर्भवती
कुँवारेपन में गर्भवती होना
समय का सबसे बड़ा पाप है
इच्छाओं को दबाती वह लड़की
नहीं करती किसी से प्रेम
वह अनभिज्ञ है यौन-शिक्षा, शुक्राणु,
अंडाणु तथा गुप्तांगों की कार्य-प्रणाली से
वह लड़की अंग-भंग चौक चंग पे, लोंग पाट, ठीकरी
गुड्डा-गुड्डी, गिल्ली डंडा, कुलाम डाल, चकरी
खेलते-खेलते फँस गई इस चक्रवात में
प्रेम करना चाहती वह लड़की
सिर्फ़ इस बात से ही भयभीत है
कि प्रेमी के ओंठों से ओंठ मिलाते ही
हो जाएगी गर्भवती
प्रक्रिया में होते ही देरी
वह करती है मिन्नतें देवी-देवताओं से
सोते में आँखें बंद करते ही
दिखती है माँ की डरावनी आँखें
जबकि वह लड़की जानती है कि
वह पूरी तरह निर्दोष है।








