अठारह दिन

बद्री नारायणबद्री नारायण5 Oct 1965

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न अक्षौहिणी सेनाएँ

न सहस्र कोटि हाथी

मुझे लड़नी पड़ती है

अपने से ही लड़ाई।

कभी भी

कभी तक

कोई समय निश्चित नहीं

जीत-हार कुछ तय नहीं

पहले से कोई तैयारी नहीं।

मैं कटता हूँ, मैं जुड़ता हूँ

मैं मरता हूँ, मैं जीवित होता हूँ।

खन-खन तेग़ चलता है

छप छप छप तलवार

बज्र, बुर्ज़, बरछा, तगाड़ी

छर- छर भर जाता है ख़ून

कविताओं पर।

याद है आपको

पिछली बार तो

अठारह दिन तक

लगातार चला था युद्ध।

बद्री नारायण
About the poet

बद्री नारायण

सुपरिचित कवि-विचारक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बद्री नारायण जन्म : 05/10/1965

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