वहाँ चार आदमी थे - बाबुषा कोहली

बाबुषा कोहलीबाबुषा कोहली6 Sept 1979

8 min read · 12.4K reads

वहाँ चार आदमी थे

पहला — शब्दों से भरा हुआ था
उसके मुँह से ही नहीं
नाक कान और आँखों से भी
शब्द टपकते थे
शब्दों के ढेर पर खड़ा
उसे गीता कण्ठस्थ थी
पर कृष्ण का पता न था

दूसरा — अर्थों से भरा हुआ था
वह हर समय परिभाषाएँ गढ़ता
मौसम खगोल रहस्य
आकाश पाताल
भूगोल राजनीति
कला प्रेम की
व्याख्या करता
अर्थों को खोजती उसकी नज़रें
मेरे उभारों और गोलाइयों की विवेचना करती थीं

तीसरा — मौन से भरा हुआ था
उसके माथे पर चन्दन चमकता
उसके मौन के चारों ओर अपार भीड़ थी
उसे पूजा जाता
उसका तना हुआ चेहरा देख लगता था
उसने अपनी ज़ुबान का गला दबा रखा हो
उसकी जबान को छोड़
बाक़ी सब कुछ बोलता था
उसके मौन में बहुत शोर था

और एक था चौथा आदमी
ख़ालीपन से भरा हुआ था
घुटनों के बल बैठा
आकाश को निहारता
उसकी ख़ाली आँखें भरी हुई थीं
खींचतीं थीं
जैसे ल्युनैटिक्स को
खींचता है चाँद
और मैं खिंच गई थी

उसके ख़ालीपन में मैंने
छलाँग लगा दी
हम एक के भीतर एक थे
पर दो थे
हमारी सटी हुई त्वचाएँ जल्द ही
ऐसी महीन रेशमी चादर में
बदल गईं
कि हवाएँ उसके आर-पार जाती थीं
बौछारें वहाँ मुक़ाम बना टिक जाती थीं
हम दोनों की सटी हुई त्‍वचाओं के बीच भी
हमने ख़ाली ही छोड़ी थी वो ख़ाली जगह
अब उस ख़ाली जगह में
गिलहरियाँ फुदकती हैं
पपीहे गीत गाते हैं
तितलियों का रंग वहीं बनता है
चाँद की कलाएँ बदलने के बाद वहीं आकर रहती हैं
वहीं बहती रहती है शराब
झरने वहीं से फूटते हैं
और एक दरवेश एक हाथ से आकाश थामे
दूसरे से धरती सम्भाले
अपनी ही धुरी पर
घूमता रहता है गोल-गोल
बाबुषा कोहली
About the poet

बाबुषा कोहली

View profile & all 42 Poems / Stories

More from बाबुषा कोहली

  1. प्रेम गिलहरी दिल अखरोट - बाबुषा कोहली

    श्याम सों होरी खेलन आई।रंग गुलाल की झोरि लिये सब नवला सज-सज आई।

    12.4K reads
  2. स्किट्ज़ोफ़्रेनिया, मुक्ति की नदी और खो-खो - बाबुषा कोहली

    (अलमित्रा ने कहा -- हमसे प्रेम के विषय में कुछ कहो। मसीहा ने सिर उठाया और सब पर शान्ति बरस पड़ी। उसने कहा -- प्रेम का संकेत मिलते ही उसके अनुगामी बन जाओ हालाँकि उसके रास्ते कठिन और दुर्गम हैं।और जब उसकी बाँहें तुम्हें घेर लें, समर्पण कर दो, हालाँकि उसके पंखों में छिपी तलवारें तुम्हें लहूलुहान कर सकते हैं, फिर भी। और जब वह शब्दों में प्रकट हो, उसमें विश्वास रखो । -- खलील जिब्रान)

    12.4K reads
  3. रेहाना के लिए - बाबुषा कोहली

    (मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की क़द्र नहीं है। चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, खूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती, यहाँ तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती. -- रेहाना जब्बारी)एक पत्ते की हरी रंगत काँपती है उम्र-भर

    12.4K reads
  4. सुकरात को याद करते हुए - बाबुषा कोहली

    जिस दिनवो दुनियावी ऐनक

    12.4K reads
  5. ख़ुदकुशी : किसी को इतने रतजगे न दो - बाबुषा कोहली

    (अत्तिला योज़ेफ़[1] के लिए)...और एक दिन अलसुबह वो बिस्तर से उठा

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like