एक
रह रह हिनहिनाता है गुलाब :
नकेल कस
दे मेरी ख़ुशबू को हवा
होकर पीठ पर सवार
मुझे भी संग ले चलो
ओ दूर देश के पथिक!
रह रह हिनहिनाता है गुलाब :
अरे ओ चमचमाते बादलों के दाँत
कुतर-कुतर पंख मेरे
पहिए बना
बह रही है हड्डियों में चंद्रमा की नींद
जागकर तू भी रात भर रात का चरख़ा चला
रह रह हिनहिनाता है गुलाब :
दूर कहीं जंगल में आग
और शहर दर शहर ज़िंदगी धूमकेतु की सी
जाने किसकी ज़िंदगी
कब बिजली बन
किस पर गिरे
जाने किसकी ज़िंदगी
कब गुलाब बन किसे डसे?
मुझे मत दोष देना ओ पथिक!
मत दोष देना
बनकर रह चुका इन निर्लज्ज हाथों में
बेबस कभी चाबुक मैं
कभी चिमटा
कभी रूमाल
रह रह हिनहिनाता है गुलाब :
नकेल कस
दे मेरी ख़ुशबू को हवा
होकर पीठ पर सवार
मुझे भी संग ले चलो
ओ दूर देश के पथिक!
दो
हर वह चीज़ जिसमें
तुम्हारी स्मृतियों की ख़ुशबू :
गुलाब है मेरे नाम!
'दूरी' हमारे मध्य
झुकी हुई टहनी है गुलाब की
ईश्वर अपना रूमाल हमेशा
गुलाब में छुपाकर रखता है।
तीन
एक गुलाब का वज़न अधिक होता है पृथ्वी से
गर पृथ्वी के साथ एक चंद्रमा रख दो
तब समझो :
'गुलाब निकलकर किताब से
सीधे हाथ में पहुँचा।'
और गर बारिश भी रख दो
पृथ्वी और चंद्रमा के साथ
तब समझो :
'गुलाब पर बैठ गई एक तितली।'
अब बचपन की ओर दौड़ते आगे बढ़ो :
'जहाँ पृथ्वी ख़त्म हो जाए
तुम वहाँ इंद्रधनुष ठहरे।'








