उस दिन
शाम ढलने को थी
कि कहीं से आने लगी थापों की आवाज़ें
कई दिनों से ढोल कुछ कह रहा था
थप-थप में रुद्धा गला
शोर में उसकी पुकार अनसुनी रह जाती
इस लकदक समय में
जहाँ बिक रहा है अध्यात्म और
हर ख़ुशी के पीछे दिख जाता है कोई प्रायोजक
ढोल न जाने कब से
शोर के चुप हो जाने की राह देख रहा था
पर शोर था कि अनेक रूपों में
विचित्र ध्वनियों के साथ बढ़ता ही जाता
आज ज़रा-सी दरार दिखी थी
वहीं से झर रहा था प्रकाश की तरह
मनुष्य की ख़ुशी का आदिम उद्घोष
अपनी थापों में लिखता हुआ मांगलिक संदेश
जिसे लेकर हवाएँ पहुँच जाती हैं घर-घर
और देखते ही देखते
धरती के नए आए मेहमान की किलकारी के साथ
जुट जाते हैं कंठ
अब ढोल और उसका विनोद
हर थाप पर और ऊँचा होता जाता नाद
सुरीला होता जाता कंठ
ढोल दुभाषिया है
किसी शाम जब जुटती हैं परित्यक्त स्त्रियाँ
वह करता अनुवाद उनके दुःख का
अपने छंद में
उसे याद है पंद्रहवीं शताब्दी की वह कोई रात
जब हाथ में लुकाठी लिए कबीर जैसा कोई
खड़ा हो गया था बाज़ार में
मशाल की रौशनी में चमकते उस जुलूस से आ रही थी
पुकारती हुई आवाज़
क्या करे ढोल अपनी उस आवाज़ का








